आज ही के दिन अमेरिका को ‘लादेन’ ने दिया था गहरा जख्म जो अभी तक नहीं भरा

नई दिल्ली| 9 सितंबर 2001 यानी 17 साल पहले अमेरिका उस त्रासदी से रूबरू हुआ, जिसकी कल्पना भी उसने कभी नहीं की थी। न्यूयॉर्क की नाक कही जाने वाली इमारत वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पलभर में राख हो गई। अल कायदा के आतंकी हमले में हजारों अमेरिकी बेवक्त मौत की नींद सो गए।

आज ही के दिन अमेरिका को 'लादेन' ने दिया था गहरा जख्म जो अभी तक नहीं भरा

यह दीगर बात है कि आतंक का बदला लेने निकले बुश रफ्ता-रफ्ता अपने ही देश के बैरी होते चले गए। अपने इरादों की सफाई कभी उन्हें सीनेट में देना पड़ी तो कभी सड़कों पर उतरे अमेरिकी और मानवाधिकार संगठनों ने राष्ट्रपति से जवाब मांगा।

राष्ट्रपति पद के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार ओबामा भी अमूमन अपने हर भाषण में बुश पर हमला बोल ही देते हैं। उन्होंने बुश की नीतियों को सिरे से खारिज करते हुए नया मसौदा तैयार करने का वादा तक कर दिया। सवाल यह उठता है कि सात साल बाद अमेरिका क्या हासिल कर पाया? क्या वह हमले के मुख्य आरोपी ओसामा बिन लादेन को पकड़ पाया? अफगानिस्तान में लोकतांत्रिक सरकार बैठा पाया, जिसका बीड़ा उसने उठाया था।

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क्या हुआ था – दुनिया पर धाक जमाने वाला अमेरिका उस समय थर्रा उठा, जब अलकायदा के आतंकियों ने चार यात्री विमान अगुआ कर भारी तबाही मचाई। चार में से दो विमान न्यूयॉर्क शहर में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर से टकरा गए। तीसरा पेंटागन पर और चौथा विमान जंगल में गिरा दिया गया। विमान में सवार यात्रियों सहित 2974 लोग मारे गए और करोड़ों डॉलर का नुकसान हुआ। इस वहशीपन को अंजाम देने वाले 19 आतंकियों को मरना ही था।

अमेरिका ने किया पलटवार – राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश को यह अंदाजा लगाने में अधिक समय नहीं लगा कि यह हरकत ओसामा बिन लादेन और उसके आतंकी संगठन अलकायदा की थी। बुश ने अगले ही दिन मौके पर कहा कि दोषी लोगों को नहीं बख्शा जाएगा और सख्त कार्रवाई की जाएगी। अमेरिका ने जल्द ही अपनी सेनाएं इराक भेज दीं। वहां उसका निशाना सद्दाम हुसैन था। इसके साथ ही अफगानिस्तान से तालिबानी शासन हटाने की कवायद भी तेज कर दी गई। वहां जोरदार घमासान हुआ, लेकिन अभी तक पूरी तरह से लोकतांत्रिक व्यवस्था बहाल नहीं हो सकी है।

इन देशों का साथ – अमेरिका के साथ इस कार्रवाई में ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे देश पूरी तरह खड़े रहे। भारत ने भी अफगानिस्तान में उसकी सैन्य मदद की है। असल में सभी नाटो देशों ने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में अमेरिका का साथ दिया।
आज ही के दिन अमेरिका को 'लादेन' ने दिया था गहरा जख्म जो अभी तक नहीं भरा
पाकिस्तान ने मजबूरी में ही सही बुश से हाथ मिलाया और अफगानिस्तान पर हमले करने के लिए अपनी जमीन मुहैया कराई थी। कुछ लोग कहते हैं कि तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के इसी फैसले की कीमत आज पाकिस्तान को चुकाना पड़ रही है, जब अफगानी आतंकी उसे भी अपने खिलाफ मानने लगे हैं।
मारा गया ओसामा – राष्ट्रपति बुश ने अफगानिस्तान में अपनी सेनाएं भेजी थीं, ताकि ओसामा और उसके साथियों का पता लगाया जा सके, लेकिन इसमें सफलता नहीं मिल सकी है। अरबों डॉलर फूंके जाने के बाद भी बुश खाली हाथ रहे। जहां-तहां हमले किए जा रहे हैं, लेकिन केवल निर्दोष नागरिक ही हताहत हो रहे हैं।

यह भी पता नहीं था कि ओसामा जिंदा है या मारा गया। लेकिन आखिर ए राष्ट्रपति बराक ओबामा ने उसे ढूंढ लिया र पाकिस्तान के एबटाबाद मे क गुप्त कार्रवाई में  उसे  मार गिराया।

अब राष्ट्रपति बुश का कार्यकाल भी पूरा होने को है और सवाल उठाए जा रहे हैं कि उनके इन फैसलों से देश को क्या हासिल हुआ? बड़ी तादाद में लोग इसे लेकर बुश की आलोचना भी कर रहे हैं। राष्ट्रपति चुनावों के दौरान भी यही प्रमुख मुद्दा है।

गड़बड़ा गई आर्थिक स्थिति – आज अमेरिका की आर्थिक स्थिति पहले की तरह मजबूत नहीं रही है। इसके पीछे आतंकवाद के खिलाफ बुश द्वारा कथित तौर पर शुरू की गई लड़ाई है। सालों से अफगानिस्तान में पड़ाव डाले पड़ी अमेरिकी सेना पर हर दिन करोड़ों का खर्च आ रहा है, लेकिन हासिल कुछ नहीं हो सका है।
वैसे भी 9/11 के हमले के बाद अमेरिका को भारी आर्थिक क्षति सहना पड़ी थी। न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज और अमेरिकी स्टॉक एक्सचेंज 11 सितंबर 2001 से 17 सितंबर तक बंद रहे। जब खुले तो बाजार बहुत गिरा हुआ था। यह अमेरिकी बाजारों की सबसे बड़ी गिरावट थी।

दूसरे धर्मों से बैर – अमेरिकी कार्रवाई के बाद दुनियाभर में एक वर्ग विशेष के लोगों के बीच उसके प्रति घृणा के भाव पैदा हो गए। खासतौर पर मुस्लिम देशों में अमेरिका विरोधी स्वर मुखर हो उठे। अमेरिका में भी मुसलमानों और सिखों को शक की नजरों से देखा जाने लगा। वहां कई सिखों के साथ दुर्व्यवहार के मामले सामने आए हैं।

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